पाकिस्तानी हिंदु- पनागरी से भारतीय नागरिक तक

पहूचे किस मार्ग में हम भटकते भटकते

हां देखो इस सफर में

गुजरे कहां कहां से

सिंध को कोई जुदा न करे सके

सिंधीयों से

सिंध सिंधीयों में वसे

सिंध यहां , सिंध व जहां

यह कविता महान सिंधी कवि श्री नारायण श्याम द्वारा उस वक्त लिखीं गई थीं जब सिंधी हिंदुओ से सिंध से शहर छिने गऐ थे और वे अपने ही मूल्क से जलावंती हो समूरे हिंदुस्तान की ठोकरे खाने को मजबूर हो गऐ थे। कवि की यह कविता इस लिऐ भी अहमियत रखती हैं कयो कि यह कविता कवि ने अपने आजमूदे से लिखी थीं। दिलचस्प बात तो यह है कि ऐसे विचार ना सिर्फ लिखको या कवियों के थे पर आम सिंधीयो के भी। विभाजान का झटका इतने जबर्दसत था कि सिंध में हिंदुओ तो ना तो संभले का मोका मिला ना हि समय। यह ही ऐक बडा कारण था कि सिंध के हिंदु हर उस जगह जहां वे वसे उनहे सिंध की याद आईं।

हिंदुस्तान – पाकिस्तान से विभाजन के वक्त हो रहे पलायन में ऐक दिचस्प बात यह भी रही कि जब कि मूसलमानो का भारत से पलायनि 1954 में ही समाप्त हो गया पर हिंदुओ के लिऐ वह आज भी जारी हैं। पलायन के परिपेक्ष में यह भी उल्लेकनिय हैं कि हिंदुओ का पलायन तो बंद नहीं हूआ पर जो जजबाद सिंध के लिऐ 1947 वाले पलायनि में देखा गया था वह भी वैसे नही रहा । मूमकिन हैं कि सिंध में हूदुओ पर हो रहे निरंतर शोसण, अत्यचार, दूरवेवहार जिमेवार हैं जिस में ऐक तरफ जहां सिंध जी तमाम हिंदु जातियो का शोसह हो रहा हैं वही इस शोसन जे जिमेवार सिंधी मूसलमान भी रहे हैं जिनका नाम 1947-54 तक कभी भी किसी सिंधी हिंदु जे जहन में नही आया।

पाकिस्तान के सिंध प्रांत  में हिंदुओ का डर, आकांशाऐ 1947 में हिंदुस्तान से पलायनि करते हूऐ मूसलमानो ने सच में बदल दी जब वे हिंदुओ की जायदाद को लूटना, जबरनि घर में घुस कर कब्जा कर लेना, मार काट फसाद करना , हिंदुओ में ऐक भय तथा अराजागता की स्थीति पैदा की। हिंदुस्तान के राज्य यू पी, तथा बिहार से पलायनि किये हूऐ मूसलमाने ने इस  लूट पाट को अपना हक समझा। यहि नही पर यह सारे वाक्ये विना किसी के भडकाने से किऐ गये । जो लूट अनारजक्ता हिंदुस्तान से पलायनि किऐ हूऐ मूसलमानो के आगमन से शुरु हूई वह तब तक चली जब तक कराची, तथा हैदराबाद जैसे शहर  हिंदुओ से पाक साफ नाही हूऐ। दिलचस्प बात तो यह हैं कि 1965 से 2012 ताक पलायनि अंदरूनी से हूआ जहा कि सिंधी मूसलमानो जी बहूंसख्या हैं। यह बात भी ध्यान देने लायक हैं कि जब कि 1947 से पलायनि जब कि पाकिस्तान हकूमत और हिदुस्तान जे पलायनि किऐ हूऐ मूसलमान – मूहाजिरो के कारण से हूई 1965 का पलायनि में सिंधी मूसलमानो और खास करके सिंध जे मूसलिम पिर-मिर-वडेरो (सिंध में मूसलमान जमींदार),

ऐसी हालातों के चलते 1947 के बाद सिंध से हिंदुस्तान की तरफ हिंदुओ का ऐक बडा पलायन 1971 की लडाई वक्त हूआ जब 90,000 हिंदु हिंदुस्तान पलायनि कर गऐ। यह उल्लेकनिय हैं उस वक्त हिंदुस्तान सेना पाकिस्तान के सिंध प्रांत के थर परकार में घुस गई थी जिसके चलते यह लोग रातो रात पलायन करने में सफल हूऐ।

1971 के पलायनि के वक्त इंदिरा गांधी हूकूमत की प्रतिक्रिया कोई कम चोकाने वाली नही रही। यह जानते हूऐ भी कि पाकिस्तान ने हिंदुओ से कैसा सलूक किया हैं 1947 से सरकार ने ना सिर्फ इन पलायनि किऐ हूऐ हिंदुओ जो वपस जाने का दवाउ डाला पर ऐसा ना करने पर प्रसासनिक कार्वही की भी धमकी दी जिसमे इन पनाहगिरियों को हिरासत में लेने से गोली चलाना तक मूमकिन बनाया गया पर हूकूमत की नही चली और इन पलायनि किऐ हूऐ पाकिस्तानी हिंदुओ जो अंत तह हिंदुस्तान सरकार ने नागरिकता प्रदान की।

1971 खे बाद की पलायनि को यदि बारिकी से जाचां जाय तो हिंदु पनाहगिरियों के लिऐ सरकारी कानुत तहत मूशकिल बनाई गई हैं पर यह सभ उनके लिऐ जो हिंदुस्तान कानुन के तहत पलायनि करते रहे हैं। कयूं की बंगलादेश के तरफ से हो रहे पलायनि गैर कानुन होता रहा हैं वे हमेशा ही कानुन के हाथो से दुर रहे और यकिनि पलायनि जी तकलिफियूं से भी कोसो दुर।

बहरआल 1971 के पाद पाकिस्तान के सिंध से पलायनि कर रहे हिदुओ जी भारतिय नागरिकता जी लडाई में अहम नाम हैं सिंमांत लोग संघटन का। सिंमांत लोग संघठनि और उनके संसथापक श्री हिंदु सिंह सोढा के कारण आज तक लाखो पनाहिगिरियो (जिस में ज्यादातर सिंध जे दलित हिंदु हैं) को ना सिर्फ नागरिकता पर पलायनि के दिन से ही सपूर्ण सहायता मिलती आई हैं जिस में शुरुआत के दिनो में खाना तथा आश्रय तक शामिल हैं।

राजिस्थान के शहर जोधपूर स्थित सिमांथ लोग संघटनि वक्त बे वक्त पाकिस्तान से पलायनि किऐ हूऐ हिंदुओ के दुखो- तकलिफो के बारे में आवाज उठाती रही हैं जिसमे धरने आदि के सवाई आम जनसभा भी शामिल हैं। विगत 20 जूलाई जो अंतर्राष्ट्रिय पनाहगरी दिवस के मौके पर ऐक जन सभा का आयोजन किया गया जिस में रातिस्थान बार ऐशोशिऐशन की जानी मानी हसतियो के अलावा समाजिक कार्यकरता की भी उपसतिथ थे।

इस पब्लिक हेअरिंग में जिन मूद्दो पर पाकिस्तानी हिंदुओ ने उठाऐ वे कुछ इस प्रकार हैं जिसे पाकिस्तान से पलायनि किये हिंदुओ ने बयान किया

क)   राजिस्थान जा लिजा न मिलना

इस जलसे में ज्यादातर पनाहगिरियों का यहि इलजाम था की हमे जान भूझ कर इसलामाबाद में भारत दुतावास राजिस्तान का विजा नही दिया जाता हैं। हम राजिस्थान के वाजा की अर्जी देते हैं पर हमे हरिद्वार का विजा दिया जाता हैं यह जान के भी कि हम गरिबो के पास इतना पैसा  नही होता हैं कि हम हिंदुस्तान के किसी भी शहर में वस सके। सिंध से पलायन के वक्त ले देकर हमारे पास कुछ बचता बी नही हैं। हम यह सेच कर पलायन करते हैं कि राजिस्ताऩ में हमे अपने सगे रिशतेदारो का साथ मिलेगा , हम किसी भी तरह गुजारा कर लेंगे पर यहां आकर तो अपनो से ओर ही दुर हो जाते हैं। हमारे साथ इतनी नाइंसाफी क्यों…

ख)   पनाहगिर पाकिस्तानी हिंदुओ जी पढाई बिच में ही बंद हो जाना

ऐसे मामले काफी सुने गऐ इस जलसे में जहां पलायनि के बाद पनाहगरी पाकिस्तानी हिंदुओ की पढाई बिच में ही चूट गई। इस जलसे में ऐक शर्नार्थी का कहना था कि हिंदुस्तान सरकार पिछले वर्गो के लिऐ काफि सुविधाऐ दे रही हैं पर यह सभ हमे तब मिलगीं जब हमे भारत की नागरिकता मिले। नागरकता मिलते मिलते दस साल तक बित जाते हैं तब तक तो हमारी पढाई जी उमर भी हम से जुदा हो जाती हैं । हम करे तो कया करे। हम हिंदु लडकियां सिंध (पाकिस्तान) में अग॒वा होने के डर से पढ ना सके और यहां कानुन हमारा दुशमन बना बैठा हैं। हमारे भाईओं की पढाई पलायनि खे कारण आधे में रूक गई यहां वे मजबूर होकर मजदूरी करते हैं। हमारी तो यही ही विनती हैं हमे भी यह मूल्क हमे अपना समझे।

ग)    पलायनि किऐ हूऐ हिंदुओ पर घुमने फिरने पर पाबंधी

इस जंसभा में ऐसै खाफी पाकिस्तानी हिंदु थे जो कि नागरिकता न होने के हेतु आजादी से घुमने फिरने पर लगी पाबंधीओ से परेशान थे। इन में काफी हिंदुओ का कहना था कि हम तो यह सोच के आये थे कि हिंदुस्तान हमारा अपना देश हैं, हम जहां चाहें हम वहा वस सकते हैं पर यहां तो हालत हमारे सोच के विपरित निकली। हमे तो अपने शहर के 20 लिकोमिटर दाईरे के बा॒हर जाने के लिऐ भी सरकारी अनुमती जी जरूरत पडती हैं। और यदि हम बिना अनुमती के किसी मजबूर के चलते चले भी जाते हैं तो हमे हवालात में महिनो जुजारने पडते हैं। अब जिन पाकिस्तानी हिंदुओ के पास पैसा वे तो पैसो जे जोर पर आजाद हो जाते है पर हम गरिब दलित जो महिनो के महिने पर हवालात में ही पडे रहते हैं।

घ)    पाकिस्तान में हिंदुओ पर हो रहे हैं जूल्म

इस जंसभा मे पिछले कुछ महिनो में पलायन  किऐ हूऐ हिंदु भी मोजूद थे जिन में मुख्य थे श्री चेतन दास जिनकी अग॒वाई में 171 हिंदु पाकिस्तान से पलायन किया था।

श्री चेतन दास के अनुसार पाकिस्तान के अदरूनी सिंध प्रांत में हिंदुओ खास करे दलित हिंदुओ पर अभूतपूर्व जूल्म हो रहे हैं। उन्होने खास तौर इस बात का जिक्र किया कि किस तरह दलित हिंदु सिंध में अपने परिजनो का अंतिम संसकार भी नही कर सकते हैं। वे अपने प्रियजनो जा पार्थिक शरिर दफनाते हैं किसके लिऐ उनहे जमिन तलाशने के लिऐ भी काफी मश्कत करनी पडती हैं। उन्होने ऐक ऐसे वाक्ये का भी जिक्र किया कि किस तरह ऐक नो साल की लडकी का मृत देह जमिनि से निकाल करे बा॒हर फैकने की कोशिश तक की गई थी। यानी सिंध, पाकिस्तान में ना सिर्फ जिते जी जूलम होता है पर मृत्यु के उपरांत भी। यहि नही उनका यह भी कहना था हमारे संतानो से वहा के स्कुलो के अध्यापक तालिम देने के बचाऐ लेटरिन साफ कराते हैं यह कह कर की तुम लोग तो भील हो , पढ कर कया करोगे…आगे॒ पिछे तो यहि काम करना हैं।

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हिंदुस्तान पाकिस्तान की सर्हदे 1954 में नेहरू लियाकत के मसझोते के तहत बंद हूई थी, पर 1950 के पूर्वी बंगाल में फसाद इन बात को बखूबी साबित कर दिया था कि पाकिस्तान में अल्पसंख्यको की क्या स्थति होने वाली हैं। कहा जाता हैं कि नेहरू-लियाकत समझोता का सबसे बडा कारण पूर्वी पाकिस्तान हिंदु बंगालीओ पर हूऐ फसाद ही थे। यह याद रहे की हिंदु-मूसलमानो जी अदला बदली सिर्फ पंजाब में ई हूई था बाकी सिंध और  पूर्वी पाकिस्तान में हिंदु की बडी आबादी रह रही थी। पर दिलचस्ताप बात तो यह हैं कि 1954 के नेहरू लियाकत के समझोते तहत पाकिस्तान से यु पी- बिहार के मूसलमान तो वापस आऐ पर हिंदुओ का वापस पाकिस्तान जाना न तो पुर्बी पाकिस्तान में मूमकिन हूआ ना ही सिंध की तरफ। यह भी ध्यान जोगी बात हैं कि हिंदुओ का पलायनि अब भी जारी हैं जब कि हिंदुस्तान से मूसलमानो तक पलायन 1947 खे 1954 तक ही चला।

इस जलसे में बहरआल किसी ने नेहरू लियाकत समझोते की बात नही कि जिस का वजूद ही इस लिये था कि दोनो मूल्को में अल्पसंख्यको पर अत्याचार ना हो । इस जलसे में आमंत्रित महमानो की नाराजगी हिंदुस्तान सरकार से थी जो सभ कुछ जानते हूऐ भी खामोश हैं।

ऐक तरह से यदि देखा जाय तो ऐसा भी नही हैं कि हिंदुस्तान सरकार को पता नही कि पाकिस्तान में हिंदुओ से कैसा सलूक किया जाता हैं। पाकिस्तान के वजूद के आने के दिन से हिंदुओ का पाकिस्तान से पलायन जारी हैं, जो वक्त बे वक्त कभी कभी कम जरूर हूआ हैं पर कभी भी बंद नही हूई हैं पर इस के बावजूद हिंदुस्तान सरकार ने ना सिर्फ नागरिकता पर  पाकिस्तानी हिंदुओ को हिंदुस्तान का विजा देने में बचती रही हैं।

2005 में हिंदुस्तान सरकार नागरिकता के कानुन में फेरबदल करते हूऐ नागरिकता प्राप्त करने की लिऐ अनिवार्य समय को पांच से बढा कर सात सार कर दीया। भारत सरकार ने पाकिस्तानी नागरिको जो विजा शहर शहर के हिसाब से देती और दीर्ग अवधी वाले विजा मिलना पर  उनके रहाईश वाले शहर के 20 मिल के दाईरे के बाहर बिना सरकारी अनुमती के नही जाने देती और मूख्य बात तो यह कि पाकिस्तान से लगे जिलो में वसने की अनुमती नही देती। मतलब सिंध में जिनके सगे॒ संभंदी जैसलमेर, कच्छ जैसे सर्हदी इलाईके में रहते हो उनके लिऐ अपने सगे॒ संभंदियो के इलाईका में वसना नामूमकिन बनाया जाता हैं।

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यदि हिंदुस्तान के विजा की भी बात कि जाऐ तो यह कम चोकाने वाली बात नही हैं कि जहां हिंदुस्तान सरकार हज के लिऐ हर साल लाखो कि  तादाद में सब्स़डी देता हैं, बिजा भी दिलवाता हैं पाकिस्तान हिंदुओ के लिऐ ना सो सब्स़ी, ना तो उस तादाद मे विजा और जिन पाकिस्तानी हिंदुओ को  विजा मिल बी जोता है वह वर्षो के इंतजार के बाद। यह  तो बात रही धार्मिक विजा की पर यदि आम विजा की बात करे तो आवेदनकर्ता को अपनी दर्खासत में हिंदुस्तान के किसी गेजेटेड आफसर जी गेरेंटी लेनी पढती हैं कि वे पाकिस्तान लोट जाऐगें। यीह सभ जानते हूऐ की भी पाकिस्तान में हिंदुओ के विरूध शोशण आम बात हैं और भारत सरकार जब भी विजा की अवधी भी पाकिस्थान में हिंदुओ के शोषण के नाप पर ही बढाई हैं ….मूमकिन हैं भारत सरकार की निती ही रही है कि हिंदुओ का पलायनि पर रोक लगे। इसके काफी राजनितिक कारण भी हो।

इस कार्यक्रम जे अंत में मोजूद महिमानो में राजिस्तान बार ऐशोशिऐश के विचार ध्यान देने वाले थे। श्रीवास्तव जी (अध्यक्ष राजिस्थान बार ऐशोशिऐशन)  का कहना था कि हिंदुओं की पाकिस्तान में हो रहे जूल्म के बारे में आवाज उठाने का उच्चितव नही हैं क्यो की वहां हालाते सुधरेंगी नही। यह तो पिछले 65 सालो से वहा होता रहा हैं। अर्थात में उस विषय पर कुछ भी नही बोलूंगा। पलायनि किऐ हूऐ पाकिस्तानी हिंदुओ जी लडाई हिंदुस्तान में हैं पर मुशकिल यह हैं यह लडाई कानुन के दाईरे में नही लडी जा सकती हैं। कानुन के दाईरे में इस लिऐ नही लडी जा  सकती हैं कयूंकी आज के कानुन में पाकिसातनी हिंदुओ के लिऐ ऐसी कोई भी समस्या से निजात नही दिलाता हैं जिस्के चलते पाकिस्तानी हिंदुओ के दुख दुर हो। सो आप लोगो को कानुन के बाहर की लडाई लडनी हैं। हम निजी रुप से तथा अपने संस्था राजिस्तान बार ऐशोशिऐशन के तरफ से सारवजनिक रूप में आपके आप के साथ हैं और रहेंगे पर लडाई आप को लडनी हैं। हक तभी मिलेंगे जब आप लडेंगे नहि तो बिना लडे हिंदुस्तान में हक मिले ऐसा कभी हुआ नही हैं।

हिंदुस्तान- पाकिस्थान जा विभाजन हिंदु-मूसलमान पर आधारित था। कांग्रेस भले इस विभाजन का कुछ भी नाम देती आई हैं पर हकिकत तो बदलनेवाली नही हैं। और फिर जमिन का विभाजन भी ऐक जैसा नही हूआ। जहां आसाम में मूसलमानो के ऐलाईके हिंदुस्तान में रह गऐ सिंध पूरा का पूरा पाकिस्थान को दिया गया। यह मसला इस लिऐ लिऐ अहम हैं कि पाकिस्तान के विपरित हिंदस्तान से 1954 के बाद कोई भी मूसमानो का पलायनि नही हूआ पर दुसरी तरफ हिंदुओ का सिंध से पलायनि आज भी पूरे दम में चला आ रहा हैं। सिंध से पालायनि करते हूऐ हिंदुओ को अपने प्रांत ना होने के कारण जो दिक्ते आती हैं उसकी तो बोत भी नही कि जाती हैं।

क्यो कि पाकिस्तान से पलायन करते हूऐ हिंदुओ की कोई लाबी नही हैं यह जिमेवारी हिंदुस्तान में सिविल सोसाईटी की भी बंती है कि वे इस लडाई को पुरा समर्थन दे दुर्भागय से ऐसा होते दिख नही रहा हैं। पाकिस्तानी हिंदु आज भी उतने ही अकेले हैं जितने वे पलायन के वक्त थे। क्या मूल्क का दर्मनिपेक्ष होने का यह मसतब हैं कि हम अपने लोगो पर जूल्म पर चूपी साधे वैठे, यह बात सोचने योग हैं। सवाल यह भी हैं कि यदि पम फिलिस्तिनियो के हको की बात कर सकते हैं तो पाकिस्तानू हिंदुओ के लिऐ क्यो नहीं…

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कब होगें अपने मूल्क के

कब होगें अपने मूल्क के

सिंध या फिर पाकिस्तान में बचे हूऐ हिंदु ऐक ऐसे चकर्वियूं में फस चूके हैं जिस से निजाद पाना इतना भी आसान नहीं हैं जैसे भारत में आम तोर से समझा जाता रहा हैं। हमारी पिड्ही जिसने कभी भी सिंध नही देखा, सिंध या पाकिस्तान में हिंदुओ के समक्ष नहीं रहे, सिंध या पाकिस्तान में ऐक हूंदू होने का अहसास नही महसूस किया, अपने ही खून के रिशते रखने वालो से बेईजत होने का जख्म नही सहा यह ऐक अभूतपर्व अहसास हैं जिसे सही रूप में समझना शायदि हमारे क्षमता के बाहार ही हैं।

पाकिसातन वाले भूअंश में वेसे देखे तो जूल्म कोई नऐ नही हैं। सिंध में हिंदु तो 712 से जूल्मो के शिकार रहे हैं। पर जिस हालत में पिछले 65 वर्षो में अपना डरावना चहरा दिखाया वह किसी को भी शर्मसार करने के लिऐ काफी हैं। सिंध मे हिंदु (जहां आज भी पाकिस्तान के 95 प्रतिशद में हिंदु रहते हैं) भले किसी भी जाती का हो, किसी भी तब्के का हो किसी भी इलाईका का हो – हिंदु होना के अहसास से बखूबी वाकिफ हैं।

सिंध में हिंदुओ से कैसा सलूक किया जाता हैं, सिंध में सामाजिक या राजनितिक तोर कैसे हैसियत हैं, सिंध में बचे हूऐ हिंदु सिंधी क्यूं पलायनि के लिऐ इतने विचलित दिखते हैं, सरकारी इरादो की कैसी प्रतिक्रिया रही उनके  के हेतु, आम सिंध में मूसलमान सिंध में हिंदुओ के साथ कैसा वहंवार रहा हैं और सिंध के हिंदु , हिंदुस्तान हूकूमत से कया उपेक्षा रखते हैं – यह ऐसे सवाल हैं जिसके जवाब हिंदु तभी दे सकता हैं जब वह वे खोफ हो और बडी  बात सिंध के बाहर हो। सिंध में हिंदु किस दहशत में रहते हैं इस बात का ऐहसास तब मिलता है जब वे शोसल मीडिया में जहां काफि कुछ वेखोफ कहां जा सकता हैं वहां पर किसी भी हिंदु की मूह खोलने की हिम्थ नही जुटा पाता….

ऐसा देखा गया हैं कि सिंध पलायन सिंधी लोहाणा (सिंधीयोका का वेवसाई समूदाय) सिंध की हालतो पर खामोश ई रहा है शायदि उनहे ऐक पाकिस्तान होने और भारतिय ऐजेसिंयो से परेशान होने खा खोफ रहता हैं। उनका डर आशांकाऐ बेबूनियाद भी नही हैं। ऐसा देखा गया हैं कि पलायनि किये हूऐ पाकिस्तानी हिंदु ऐजेंसियो के द्वारा परेशान किया गये हैं यह परेशानी तब तक नहीं टलती हैं जब तक उन भ्रष्ट सरकारी अधीकारियो के जेब न भरे जाये। खैर अहमेदाबाद में मूझे इतिफाक़ से ऐसे श्री मिर्मलदास तथा उनके परिवार से संपर्क करने का मौका मिला जो यहां 20 साल से रह रहा हैं (बिना नागरिकता के) और अहम बात कि वे सिंध में हूऐ अत्याचारो के प्रसंग में कुछ भी छूपाने की कोशिश नही की।

अपने बारे विवरण देते हूऐ श्री निर्मलदास ने कहां कि – में सिंध प्रांत के लाडकाणे शहर से हूं। गावं रतोतिल। सिंध में हिंदुओ की लिऐ हालते 1960 से के बाद ही फिरने लगी थीं। मेरी जिंदगी में पहिली बार हडकम तब आया जब मेरे दो सोलों को दिन दहाडे भरी बजार में कतल किया गया। ऐक ने उस घटनास्तल पर ही दम तोडा दूसरे को कराची ले गऐ पर उसे बचा न सके। वह 21 दिन तक मोत से लडता रहा पर फिर अपनी हार मान ली। बात वही पर ख्तम नही हूईं। मेरे ससूर जी को अग॒वा किया गया जिसे हमने भारी रकम देकर आजाद कराया और मूझे भी अग॒वा किया गया पर मैं किसी भी तरह भाग निकलने में कामयाब हूआ। हम अकेले नही हैं जिस्से ऐसे जूल्म हूऐ हों। सिंध में हम घरो से निकल कर सभजे ज्यादा धयान इस बात को देते हैं कि कही कोई हमारा पिछा तो नही कर रहा हैं। रात को अकेले निकलने का तो सवाल ही नही पैदा होता हैं। हम इस की पूरी कोशिश करे की हम हर नजर से मूसलमान ही दिखे – वेश भीषा या फिर शकल से कहिं किसे यह ना लगे कि हम हिंदु हैं।

श्री निर्मल दास हिंदुस्तान आने के हेतु कहना था कि वे अहमेदाबाद,  सिंध रहते ही तिन महिने के विजा पर आये थे आर फिर तिन महिने और बडाया था। यहा मूझे अमन आराम तथा सकून मिला। मैं तो मोत कबूल करूंगा पर फिर पाकिस्तान नहीं लौटूगां।

विभाजन के बाद जन्में सिंधी जिन्होने बचपन से हि सिंध में धर्निपेक्षता के मिसाल के बडे बडे किस्से सुनते सुनते बडे हूऐ हैं यह ऐक निहायत आश्चर्य चकित करने वाले मजर हैं और उस्से भी परेशान करने वाली बात तो यह हैं कि यह सब ऐक ऐसे ईलाको में हो रहा हैं जहां पर सिंधी मूमसलमानो की ब़डी तादाद रहती हैं। श्री निर्मलदास का कहना था किस लाडकाणे में विभाजन के बात भी काफी संखया में हिंदु रहा करते हैं अप बहूत कम या ना के बराबर ई हिंदु बचे हैं। जबरनि धर्म परिर्वतन, आगवाउ, कत्ल में हिंदूओ जा जिना मूशकिल कर दिया हैं। हम मूसलमानो की तरह डाड्ही बडहा के रखते हैं जैसे किसी अंजाने को समझ में नही आये तो हम वाक्ई मूसलमान नही हैं। सिंध में हालते इनती खराब हैं की हम प्रदर्शन तक नही कर पाते कहिं मूसलमानो को ऐसा ना लगे कहि हम उनहे बदनाम तो नही कर रहे हैं।

ऐसे देखा जाय तो हिंदुस्तान – पाकिस्तन जे बिच ऐक समझौता पहिले मोजोद हैं जो दोनो देशो के धर्मिक अल्पसंख्यको के इंसानी हको के हेतु वजूद में लाया गया था पर ना हिंदुस्तान की हकूमत ने पाकिस्तान से  इस पर नाअमल होने पर आवाज उठाई हैं और हिंदुस्तान का सिंधी समाज। गुजरात के अहमदाबाद के सरदार नगर निर्वाचन छेत्र जहां पर कोई कितना भी बढा राजनेता ना हो इपनी विजय तभ ही सुनिश्चित कर सकता हैं जब सिंधी मतदाताओ का साथ हो वहा पर भी सिंध या पाकिस्तान से पलायन किये हूऐ हिंदुओ के मसले कभी चुनावी मुद्दे नही बन पाऐ। पिछले साल यहां पर अंतर्राष्ट्रिय सिंधी सनमेलन आयोजित हूऐ जहां आड॒वाणी, मोदी समेत काफी अगवानो के शिर्कत के बावजूद पाकिस्तान से पलायन के मूद्दे का जिक्र तक नही हो पाया।

पलायन कभी आसान नही होता और हर पलायनि के अपने मसले रहे हैं। जब कि 1947 के पलायनि के वक्त लोग बस अपने अंग को ढकने वाला ऐक ही वस्त्र ही बचा पाऐ थे पर 1954 के बाद की पलायन में नागरितका ऐक बहूत बडा मसला रहा हैं। किसी भी पलायनि किये हूऐ हिंदु को 7-10 के बाद नागरिकता कि प्रक्रिया शुरु होती हैं जो 4-5 साल चलति हैं। किसी किसी राज्यो में मिल भी जाती हैं पर किसी में (जिनमे राज्य सरकारे इस में दिलच्सपी ना लेती हो ) मसलनि गुजरात में 30-30 साल बाद भी नागरिकता नहीं मिलती उपर से रिशवत खोरो सरकारी अफसरो का मसलो सो अलग मूसिबत।

गुजरात में सरकारी अफसरो के लिऐ सिंध से पलायनि किये हूऐ हिंदुओ ने मानो आसान कमाई ऐक बडा जरिया खोल दिया हैं। अहमेदाबाद में डा रमेश (नाम बदला हूआ) का कहना था की हम 20-25 पाकिस्तनी हिंदु क्या कही ऐकत्रित हो गऐ अफरसो के फोन आने शुरु हो जाते हैं, और फिर पुछताछ का ऐक दोर शुरु हो जाता जिसमे  यदि कोई कच्ची नस वाला निकल जाता तो अफसर अपनी कमाई का अवसर किसी भी हालत में नही गवाता। वे तभी शान्त होते जब उनकी जेबे भरी जाती। श्री निर्मलदास के बेटे का कहना था कि हर अफसर जब भी बुलाते हमे सारा सारा दिन बैठाकार रख देते। ना सिर्फ हमे पर हमारे बीबी बच्चो और यहां तक की हमारे गेरेंटर तक को भी। छोटी छोटी बात पर फटकाते और बे इजत करने में पल भर की देर नहीं करते। अजब जैसी बात तो यह हैं कि यह सभ ऐक ऐसे राज्य में होता रहा हैं जिसे हिंदुत्व की प्रयोगशाला तक कहा गया हैं। यहि नही पलायनि किये हूऐ हिंदु बताते हैं पूरे हिंदुस्तान में गुजरात अकेला राज्य हैं जहा पर पाकिस्तान से पलायन किये हूऐ हिंदुओं को अपना दीर्घ कालिन विजा ना बड्हा पाने के कारण वापस तक जाना पडा हैं पर इस बावजूद भी सिंधी समाज खामोश, हिंदुओ की बडी बडी लडाई लडने वाले हिंदु नेता भी खामोश।

सिंध या पाकिस्तान से हो रही पलायनि करने वालो के लिऐ समस्या  यह भी हैं कि ऐक पलायत मूसलमानो के द्वारा भी हो रही हैं। चूकि पाकिस्तान (सिंध) और राजिस्तान की सर्हद की तरह बंगलादेश की सर्हद सिल नही हैं पलायनि ना सिर्फ आसान हैं पर गैरकानूनी भी। और फिर वोट बैक की सियासत ऐसे मसलो को जल्दी हल भी नही होने देती। कयूं कि बंगलादेश से पलायनि गैर कानूनि हैं, बिना किसी कागजात के हैं सरकारी अफसरो को पता भी नही चलता कि कोन बंगलादेशी हैं और कोन हिंदुस्तान का बंगाली मूसलिम नागरिक। ऐक तरफ आसानी से हूआ पलायनि तो दुसरी तरफ सालो तक इंतजार बाद मिला विजा और नागरितजा की समस्यांऐ और उपर से सरकारी अफसरो की मांगे सो अलग मूसिबत।

सन् 2005 में भारत सरकार नागरिकता के नियमों में बडा फेरबदल करते हूऐ नागरिकता देने का हक जिला मेज्स्ट्रेट से झिन कर गृह मंत्रालय को सोंप दिऐ। इस्से आसम या बंगाल में बंगलादेशी मूसलमानो को आसानी से मिल रही नागरिकता मिलनी तो बंद हो गई पर पाकिस्तान से पालायनि कर रहे हिंदुओ की सम्सया ओर भी जादा बढ गई, अब उनहे अपने नागिरकता के हेतु दिल्ली तक के धके खाने पडते।

साल 2011 में धार्मिक विजा को भी दिर्घकालिन विजा में बदल पाने की अनुमती हेतु आदेश के बाद भारत सरकार ने को नोटिफिकेश जारी की थी उस में साफ लिखा गया था कि भारत सरकार ने पाकिस्तान में हिंदुओ से हो रहे अत्याचारो की जाच कि हैं और इनहे सही पाया हैं। भारत सरकार भी 1954 से सामान्य विजा को दिर्घ कालिन विजा में बदलने की अनुमती दे रही हैं वह भी इस पर की वहां पाकिस्तान में हिंदुओ को धार्मिक भेदभाव का निशाणा बनाया जा रहा हैं पर नागरिकता का जब तक कानुन की जब बाद आती हैं तो दोनो पलायनि ऐक करके देखे जाते हैं।

भारत सरकार के द्वारा प्रकाशित अधीसुचना

भारत सरकार के द्वारा प्रकाशित अधीसुचना

ऐसी बात नही हैं कि संसथाऐ नहीं है जो पाकिस्तानी हिंदुओ को लिऐ काम नही कर रही हैं आम तोर से हिंदुस्तान में सिंधी समाज इसे ऐक समस्या ही नही मानता और यह ही कारण हैं कि पाकिस्तानी हिंदु के मसले कभी सिंधी समाज के मसले नही बने। इस के अलावा सिंधी समाज का जातिवाद भील मेघवार वगिराह की लडाई लडने वाले सिमांत लोक संघटन के सर्बराह हिंदु सिंह सोढा को अपाने ऐक हद तक रोका हैं जब कि उनहे लग भग हर सिंधी उनके काम से वाकिफ कयूं ना हो। हा अपनी नागरिकता के लडाई के हेतु कुछ उची जाती वालो ने जरूर लाभ लिया हैं पर जब उस संसथा को अपनाने के लिऐ कद्दपी तयार नहीं हैं। उनका काम कया निकला वे ऐक तकफ और संसथा दुसरे तरफ।

अहमेदाबाद में जितने भी सिंधीयो से मेरा संपर्क हूआ लग भग सबका यही विचार था कि यह ऐक बडी समस्या हैं पर इस समस्या के लिऐ आगे बढ कर मूकाबला करने के लिऐ शायदि ही कोई त्यार हैं। उनके लिऐ उनकी लडाई और कोइ लडे वे महज साथ ही दे सकते हैं।

मलतब साफ हैं अंग्रेजो के दिनो जिस मोकाप्रसती के चलते हमने पूरा सिंध ही गवा बैठे वही मोका प्रस्ती पूरे शबाब में सिंधीयो मे झलकती हैं। जब तक हम अपनो के दुखो को समझे, अपनी गलतियो से सबक ले पाकिस्तानी हिंदुओ को अपने ही मूल्क में ऐक विदेशी की हमेशा ऐजेंसि के शक और सरकारी अफसरो के रहमो करम में ही रहना हैं।

मूसलमान काफिरो को वोट ना दें

यह फर्मान सिंध पाकिस्तान के थर परकार में प्रकाशित किया गया हैं की मूसलमान गैर मूसलमान को वोट ना दे। यह याद रहे की थर परकार में हिंदुओ की बडी तादाद रहती हैं।

भिस्म अल्लाह अलरहमान अलरहिम

मूसलमान गौर करें। हमारे मूल्क पाकिस्तान का मतलब कया हैं?? हम इसी मूल्क पाकिस्तान के लिऐ कुछ सोच कर कदम उठाऐं। आज हम मूसलमान अपने मूल्क पाकिस्तान के हिफाजत करने के विपरित हम अपने खूद अपने उपर गैर मूसलिम असलाम धर्म के दुशमन गैर मूसलिम को वोट देकर अपने सर के उपर बैठा रहे हैं। हमे चाहिऐ कि हम अपने प्यारे नबी सलि अल्लह अली वस्लम की फर्याद को अपने सिने में जगह देकर इनही काफिरो और इसलाम के दुशमनो के मूकाबला करें जो अल्लाह तालिया और उनके नबी जे दुशमनि हैं। इन्ही काफिरों का जम कर मूकाबला करे जैसे हम कामयाब हो पाऐं। आज हम मूसलमान कमजोर हो चूके हैं। गैर मूसलमान हम पर हावी  हो गऐं हैं। क्यो की हम में इमान और गैरियत नहीं हैं  कि हमारा मूल्क पाकिस्तान औरतों और गैर मूसलमानो के हाथ चला गयै हैं। अल्हा के नबी का फर्मान हैं कि – “जिस मूल्क जी सर्बराही किसी औरत के पास हैं तो वह मूल्क तबाही के किनारे पर हैं- आज हम मूसलमान औरतो को बादशाहो की कुर्सी पर बैठा कर, अजरक ठोपी पहन कर रोडो और रासतो पर नचा रहे हैं।“ हमें शर्म आनी चाहिऐ। आज मूसलमान के गैरत जा जनाजा निकल चुका हैं। गैर मूसलमान औरतो को आगे वढा कर हमारी गैरत को ल्लकारा हैं।

इंशा अल्हा गैर मूसलिम संसथाउ का जम कर मूकाबला करेंगें। मूसलमानो ….खोलो अल्हा का कलाम औरतो के लिऐ क्या हूक्म हैं …अलल्हा का फर्मान हैं कि ऐ नबी अपने घर के मोमिम मर्दो ऐं औरतो को कहो कि वे घर के अंदर रहें। सिंगार करके घर से बा॒हर ना निकले। यहि मजबूर हो कर या किसी सख्त बिमारी के कारण घर से निकला ही हो तो पडदा करके निकले। अल्हा के प्यारी नबी सली अल्हा आलिया वसल्लम की प्यारी बेटी फातिमा अलजहराह अनहा आखरि वक्त में वसियत की थी कि – मेरा जनाजा रात को उठाया जाय। मेरे जनाजे पर किसी गैर मर्द की नजर ना पढे।

आज हमारी मूसलमान औरते गैर मर्दो के हाथ में हाथ डाल के घुम रही हैं।।

द्वारा

महमद रमजान लूंड
अधयक्ष मदरासा दार अल कुरान वालहदेस

फोन – 0092 301 8322809
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कडवा सच या सिधा सा समिकरण

यह लेख मैने ऐक बंगाली हिंदु ग्रुप से लिया हैं। लेख पढते ही ही मैने इसे बंगाली सें हिंदी में अनुवाद किया। लेखक का नाम नही बाताया गया था शायदि यह आज की हालातो का असर ही हो।

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कडवा सच या सिधा सा समिकरण

यह तो पानी की तरह साफ हैं, किसी को बताने की जरूरत नहीं हैं बी ऐन पी (खालिदा जिया की पार्टी) जमात हमारे चिरकालिन शत्रु रहे हैं अर्थात उनके बारे में लिख कर गले मूर्दे उठाकर पुरानी बातो को दहूराना नही चाहूंगा, पर अवामी लिग के बारे में कया कहा जाय….। यदि हम कहे कि अवामी लिग हमरे ही द्वारा पाला पोसा हूआ ऐक जहरिला साप है तो कया गलत होगा!!! ..चलिऐ इस पर थोडा सोच विचार करते हैं….इत्हास देखिऐ अच्छी तरह, देश स्वाधीन होते न होते ही बंगबंधु शेख मूजिबर रहमान कट्टरपंथी इसलामी संघठन ओ-आई-सी का सदस्य होने हेतु दौडे थे और सदस्यता हासिल की थी। जो हिंदु देश छोडकर हिंदुस्तान पलायन कर गऐ उनकी संपती हूई थी शत्रु-संपती। बंगाली राष्ट्रवाद के नाम पर देश स्वाधीन होते ही प्रचलित शिक्षा वेवस्था होने के वावजूद मदरासा बोर्ड का गठन किया गया था जैसे इसलामी चेतना और विचारधारा समनित ऐक सेना त्यार की जा सके। रोमना काली बाडी और आनंनदोमोई आश्रम बूलडोजर से विनाश कर यह सारी संपति सरकारी संपती करार दी गई। और रही कसर बंगाली जातियवाद दी दुहाई देकर बंगलादेश में हिंदु अल्पसंख्यक को दिया गया आरकक्षण भी हठाया गया, खैर जो भी हो वे (शेख मजूबर हरमान) हमारे राष्ट्रपिता थे, उनके उठाऐ गऐ कदमो को हम आलोचना नही कर सकते शायदि आमारी किसमत में यह सभ लिखा था। इस के बाद आया 1995 की विभीषिका इसके ऐक दशक बद होता हैं शेख हशीना का आगमन, वही जानी पहचानी जजबाते और साथ ही साथ हमारी (हिंदुओ) का आवाजे अल्पसंख्यक की आवाजे हो जाना…वही लाल फाल की टांगाईल साडी और ममता भरा चेहरा…वे अवामी लिग में उग्र तरिके से आईं, स्नेह से हिंदुओ ने उनहे अपनाया, उनके साथ खडा हूआ था, आपना समझ के। 90 के दशक आते आते ही शहीद जननी जाहानारा इमाम की लोकप्रियता आसमान पर थी, ऐक जन नेता की तरह आम दिलो में अपनी जगह बना ली थीं, हमारी अपनी शेख हसीना के लिऐ शायद यह  कुछ समीकरणो की चूक थी और उनके जन नेता होनी की सबसे बडी अडचन। उस वक्त शेख हसिना अपना निजी समिकरण के तहत उस समय बहूचर्चित लेखक मोतिउर रहमान रेंटूर की लिखी हूई पूस्तक आमरा फासी चाई (हम फासी चाहते है) में दर्ज की हूई सचाई को दबाने में कोई कसर नही छोडी थी. इस किताब से जाना जाता हैं कि हमारी प्रिय परमस्नेहि शेख हसीना भारत में बाबरी मसजिद के विधंश के परिपेक्ष में आपने निजी फायदे हेतु पैसो के जोर ते किस तरह ढाका तथा बंगलादेश के अन्य शहरो में हिंदुओ के घर तथा मंदिर जालाने के निर्देश दिऐ। और हूआ भी कुछ ऐसे ही था- हिंदुओ के घर बार तथा मनदिरो को जलाकर ऐक अनारजकता फैलाई गई थी पूरे देश में। हसिना तब हिंदुओ के साथ खडी थी, सहानुभूति दिखाई थी और यह समझाया था कि यदि अवामी लिग हूकूमत में आई तो यह सब बंध होगा, इस खेल में वे सफल हूईं थी। (आमरा फासी चाई किताब पर 1996 में आवामी लिग की हूकूमत ने प्रसिबंध लगा दिया था ) शहिद जननि जाहानारा ईमाम नेत्री नहीं बनी या नहीं बन सकी, तब के बाद शेख हसिना हमारी नेत्री और हमार गर्व। 1996 से 2001 तक वे सत्ता में रही, इस दौरां हमे कया मिला हमने कया खोया यह सभ हम जानते हैं। 2008 में फिर वे सत्ता में आईं इसी के वही हमारी रक्षक रहीं। खालिदा जिया और ऐरशाद नें इसलाम को राष्ट्र धर्म करार दिया जिसकी सहमती हमारी प्रिय हसिना ने भी दी, इसका मतलब यह हूआ की कोई इसे बदल नही सकता। इसके विरुध हम प्रशन नही उठा सकते। देश द्रोही कहलाऐंगें । बंगलादेश में धर्मनिर्पेशता और असामप्रदाईकता अपनी आखरी सास ले चूकी। हिंदु भले ई राष्ट्रवाद या आजादी की लडाई की विर गाथा कयूं न गाते रहे उनकी किसमत में तो शुन्य ही हैं। मूझे तो मूक्तियूद्ध चेतना से दुख ज्यादा होता हैं। 1971 मे आजादी के बीज हिंदुओ ने बोऐ थे, 100 प्रतिशद आजादी के कट्टर पक्षधर थे। संविधान नें हमे दुसरे स्तर का नागरिक बना दिया। हम माने या ना माने यह अब अपना अपना वेक्तिगत मसला हैं। मदरासा बोर्ड में बी-ऐन-पी-जमात सरकार से ज्यादा अनुदान हसिना सरकार का रहा हैं, यह मदरासा से निकले छात्र कया शुसिल समाज की नुमाईंदगी करेंगे….2012 में पाथघाटा, हाठजाबी, बागेर हाठ, दिनागपूर , चिचिर बंदर में अनुउत्तेज्त हिंदूओ के घर जलाना, लूटना, मंदिर तोडना हूआ पर  हमारी हसिना ने झुटे दिलासे तह नही दिऐ। रामू वाक्ये में वे पहाडो तक दौड के गईं कयूंकि वहां अनुदान का मामला था, हिंदुओ के साथ भला वे कयूं रहें…कया हैं हिंदुओ में …विश्वजित दास की हत्या की छात्रों ने,  हसीना जी ने जाच पडताल तो की नही ,कभी भी परिवार के पास नही गईं सहानुभूति के दो लफज बोल्ने के लिऐ विश्वजीत के घरवालो के समक्ष। कया यह सभ इस लिऐ की विश्वजीत हिंदु था…हिंदु मरने से ही क्या या जिने से ही क्या…ब्लागर राजबिर खे घर जाने का वक्त है उनके पास कयूं की वे पहले मूसलमान हैं और फिर देशप्रेमी ब्लागर, और विश्वजीत तो पहले था ऐक हिंदु , बाद में मेहनतकश बदकिसमतऐक कथन हमारी नेत्री हमेशाहि दहूराती रहती हैं –अपने पिजनो के खोने का दर्द मैं  महसूस कर सकती हूं ….हो सकता हैं वे समझती हों पर घर-बार तथा धार्मिक उपासना का दर्द वे नहीं समझेंगी, बहन, मां, बेटी के बलात्कार का दर्द आप नही समझेंगी। 2001 से लेकर 2006 तक हूऐ अल्पसंखयको पर हूऐ अत्याचार का कोनूनी लेखा झोका लेने की बात आपने की थी, क्या उनहे आपने न्याय दिया। नही अपने उनसे न्याय नही किया। यदि उस दिन यदि इस अत्याचारो का हिसाब लिया गया होता तो आज जो हमारे घर-बार या मदिर तोड रहे हैं उन्हे भी इस बात का डर रहता कि हमारा भी कभी विचार होगा, हमारा भी हिसाब लिया जाऐगा। यह सिधा सा समिकरण हैं, नही समझपाने की कोई बात हैं ही नही । ऐक विशाल राजनितिक खेल रचा जा रहा हैं।

हिंदु यदि मार भी खाते हैं तो उनके पास दो राहें है….

  1. सर निचा करके अपने ही देश में गैरों की तरह रहें
  2. पानी कि किमत पर अपने जमिन जायदाद बेछ कर हिंदुस्तान या ओर किसी मूल्क में पलायनि कर जाऐं।

यदि पहला विकल्प लिया जाय तो फायदा अवामी लीग का हैं। अपनी सरकार होते हूऐ भी इसने जुल्म…बी ऐन पी जमात आते ही तो हमे टूकरे टूकरे कर दिये जाऐंगे।।।उसी लिये भाई वोट अवामी लिग को ही देना हैं और किसी भी मूल्य पर अवामी लीग को ही हूकूमत में लाना हैं .

यदि फिर दूसरा विकल्प हिंदु लेते हैं तो भी लाभ अवामी लिग का ही हैं- पानी की किमत जो जमिन जायदादे बिकेंगी या फिर इस घोर विपती के दिनो में जो अवामी लिग के कर्यकरता बडी दया से रात के अंधेरे में बार्डर पार कराऐंगे , जमिन जायदाद का हक भी उन्ही अवामीलीग सथानिय नेता का होगा। इत्हास भी यही ही कहता हैं। नहीं तो अवामी लिग की स्थानीय अकाईंया लग भग हर वार्ड में हैं, प्रशासन के साथ कयूं नहीं वे हिंदुओ के हिमायत में खडे हूऐ। कयूं नहि रात के अंधेरे में सरेआम मंदिर – घर तबाहि करने वालो को सरेआम मारा-पिटा नही गया। किस आधार पर मूल्क के गृह मंत्री कहते हैं कि परिसतिथियां नियनत्रं में हैं ….आज हमें गम्भीरता से सोचना होगा, हम चारो तरफ से शत्रूओ से घिरे हूऐ हैं- दाऐं बाऐ सामने या पिछे। केवल उपरवाले ईश्वर पर ही भरोसा हैं। यहां पर अभी बंगलादेश में दो कडोड हिंदु हैं – यह भी कोई इतनी कम संख्या नही हैं, काफी उन्नत देशो से भी जादा। यदि ऐक बार हम ऐक हो जाऐं , अपने भेद-भाव भूल कर अपने अस्तितव की लडाई लडने के लिऐ त्यार हो सके हिमत करके बोल सके तो समूरी राजनेतिक पार्टियां भले वे अवामी लिग हो, जमात हो या फिर बा ऐन पी या जमात – हमारे पैर चूमेंगे। हमारी इच्छा शक्ति और संकल्प हैं उसे काम लेना पडेगा, हमारे में जो सच्छा देशप्रेम हैं और जो सच्चाई हैं, हमारे में जो निष्ठा हैं यदि हम इसे ऐकत्र कर पाऐ, ईश्वर का आर्सिरवाद हमारे में फैल जायेगा। पर उस के पहले हमे यह घोर विपत्ती के दिन पार करने होंगे। ऐक साथ होन पडोगा। जमात हो, बीऐनपी हो या फिर जतिय पार्टी या अवामी लिग हो , जो हमे उपेक्षित करेगा, हमारे घर मंदिर तबाह करेगा, वही हमारा असतित्व का शत्रू होगा। इनके विरूध का तरिका ढूंड लिकालना पडेगा। इनहे निशानदेहि करना पढेगा। यदि सौ लोग हमारे घर जलाने आते हैं तो उसी चिता में उनके भी किसी ऐक को जला देना पढेगा। नहि तो हमारे लिये अत्मरक्षा के हेतु पूलिस की गोलियो के सवाई कोइ सहारा हरा भी नही बचा रहेगा । बास की लकडीया और उनके द्वारा जलाई गई आग ही हमारे हथियार हैं। हमे अपने पैरो पर खडा होनो होगा भले कोई हमारे साथ खडा हो या ना हम दो कडोड को ऐक साथ खडा होना पढेगा। जागो भाइ जागो चलो मरना है ही तो लड के मरें , जियें तो संमान से जियें ….हरी ओम

(नोट- अंधे अवामी लीग समर्थको से माफी चाहता हूं , दिवाल से पिठ लग चुकी हैं, पेट और पिठ ऐक हो गईं हैं और बरास्त नही हूआ सो उगाल दिया)

मेरे दर्द की हर बार बोली लगी

सुश्री वेंगस सिंधी भाषा की जानी मानी पत्रकार रही हैं । वे सिंधी, उर्दु तथा अंग्रेजी भाषाओं में सिंध, सिंधी या मानवअधीकार के मामले में लिखा करती हैं। उनके लेख सिंध , पाकिस्तान की सिंधी अखबार इबरत तथा फांटियर पोस्ट में प्रकाशित होते हैं।

पेश हैं उनही का ही ऐक लेख जो मूल उर्दू में लिखा गया था । यह लेख लेखिका की अमुमती ते हिंदी में अनुवाद किया जा रहा हैं।

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मेरे दर्द की हर बार बोली लगी

 

वेनगस

 

 

मेरे दर्द की हर बार बोली लगी.

हे भगवान, मेरी माँ ने कहा था,

तू हर समय मोजूद है?

मैंने जब कोई सपना बना,

इस उम्मीद से की तो उस को  देखती होगी,

क्यों के तू हर जगह मोजूद है?

पर मैं भी कितनी भोली थी,

ऐक सपना का सहारा ढूंढने लगी.

मेरे सपने को कहीं पे भी सहारा नहीं मिला,

मेरी हर उम्मीद हर सांस टूट गई,

जब मेरी बोली लगी,

बीच बाजार में,

तुम्हारे नाम के सहारे,

मैंने तुम्हारा सहारा मांगा था ऐक सपना के लिए,

पर यह क्या ….?

बोली लगा वाले ने  कहा था ,

 

तेरा और मेरा खुदा एक नही.

पर मां ने तो कहा था.,

तो क्या पृथ्वी की तरह आप (भगवान) के यहां भी विभाजन हैं …?

मैं क्या जानु.

मेरी जब बोली लगी,

तो मेरे कानों पर नाम केवल तेरा पड़ा,

आज इन लोगों ने मेरी बोली लगा कर फत्ह कि हैं …?

उस वक्त हे भगवान तुम भी तो मौजूद होगे ना …?

जब उन्होंने बोली लगाई थी,

मेरे दर्द की सदा तुमने ना सुनी ?

मेरे दर्द की हर बार बोली लगी,

और बोली को बीच बाजार में लगाने वाले ने,

तेरा सहारा हर बार लिया,

क्या तुम ने ना सुना,

जब मेरे दर्द की हर बार बोली लगी …?

हलीना

 

मैं सोचती रही हूँ कि आखिर में किसके लिए लिखूं ..क्या अपने दर्द पर कसीदह लिखकर अपने ही दर्द पर रोडाली की तरह मातम करूँ?

 

या फिर मूल्क  के इंसाफ पसंद रखवालों को जाकर कहूं कि आप जरा उस पार भी आइने ओर गौर से देखे कि हमारे साथ क्या हुआ है, लेकिन गरीब की सदा कौन सोने ?

तो फिर इंसानी हको के  रखवालों के पास जाए जिनके पास गरीबों के दर्द सुने के लिए बड़े परियोजना / ठेके चाहिए.

हम भी कितने सादे और भोले हैं यह ना जान पाए गरीबों के दर्द को अमीर की नगरी में कोई ना सुनेगा पर उस दिल का क्या करें जो हर बार उम्मीद की बारिश करता है और कहता है कि शायद इस बार कोई अपने महल से बा॒हर झाक कर उसे देख लेगा. कोई तो हमारे जख्म भी देखेगा.

तो क्या कोई हमारे दर्द पर दो आंसु  भी नही बहाएगा ? पर यकीनन मैं गलत थी इस दुनिया में गम  की जागीर सिर्फ अपने तक ही रखता हैं , कोई भी दो कदम आगे कर नही आएगा.

 

ऐसा ही गम कुछ इन दिलों का भी है जिसे सुन के भी अनसुना किया गया, जिनके जख्मो पर  किसी ने मरहम नही रखा. यहां तक ​​उनके दर्द को जो नाईंसाफी पर कुछ लोगों ने कह दिया दरअसल इस को  आप इस तरह नही उस तरह देखे,  आप इतने भावुक ना हो … अरे यह क्या आप तो सिंधी लोग कहिं  ज्यादा जजबाती नही हैं…… बात सिंधी, बलूच, पखतोन और पंजाबी की नही है. बात नाहक की है पर सबने चुप का रोजा रखा है.

 

बात यह है कि चुप का रोज़ा क्यों रखा जाता है जब इक मासूम लड़की जे मज्हब के नाम पर अगवा की जाती हैं . उस समय मेरे प्यारे मूल्क की गैरतमनद मीडिया और मानवाधिकार के ठेकेदार क्यों चुपी का साहारा लिऐ अपने होठ सिंल दिऐ , क्यों नही दिल्ली रेप केस की तरह पाकिसतानियो की गैरत उठ पड़ी?

 

चक, (शिकार्पूर ) घटना जिसमें तीन हिंदू डॉक्टर शहीद किए गए यह हादसा मेरे प्यारे शहर शिकार्पूर में हआ में  जो शिकारिपोर के सीक्योलर ऐपरोच  से बचपन से जानती हूँ खैर समय की बेरहम लहर ने कुछ ऐसा खेल खेला जो मैंने अपने आप को इस शहर से निर्वासित कर दिया. कभी कभी जाना होता लेकिन अब इस शहर की द्वार पर अपना कोई नहीं … लेकिन ऐसा नही है हम कुछ भी कर ले पर बचपन फिर पुकार है और चक घटना के बाद ऐक  खूनी चीग हुई. मुझे अब भी याद है जब मेरे छोटी बहन ने रों के कहाँ वह क्यों मेरे शहर को धर्म की तलवार से फस्ह करना चाहते हैं??! मैं चुप रही.

 

मीडिया अरे हाँ … राष्ट्रीय मीडिया का कया कहना … हाँ मारवी (मारई) सरमद ने चक घटना पर डेली टाईमज़ में लेख लिखा था, लेकिन मीडिया और चीफ ऑफ जस्टिस इफ़्तिख़ार चौधरी ने सु मोटो नही लिया. शायद तीन डॉक्टरों का कल्ल महत्व नही रखता हो. तों फिर हम भी पूछना चाहेंगे कि मूल्क  में अहमियति किस बात की है? चक घटना के बाद ऐक  हमदर्द ने फोन करके कहाँ मिस वेनगस अब आप देखे हैं जब सिंध में चरमपंथी की लहर उठेगी पर मैंने कहा था कि  हाँ मैं मानती हूँ धर्म के नाम पर एक बार फिर खेल रचा जाएगा।  हम इस बार सियासी यतिमो बन कर रह गऐ हैं लेकिन मैं मानती हूं कि इस धरती पर कोई इतनी आसानी से मजहब के  नाम पर दीवार नही खड़ी कर सकता

 

यदि देखे  चक घटना से पहले भी सिंधी और बलूच हिंदू भारत जाने लगे थे । मुझसे याद है मैं अपने कॉलम में लिखा था क्या वह मूल निवासियों निकाल कर सिंध और बलोचस्तान में रियासती इरादे अपने लोगों को आबाद करना चाहते हैं? अखिर रियासत की चुप्पी को कुछ नाम तो देना पड़ेगा ?

 

इसके बाद द्वार पर इक खबर ने दस्तक दी के रिंकल कुमारी नामकी ऐक लडकी ने मुस्लिम लड़के के साथ शादी कर ली. खबर कुछ हजम नही हुई.

 

24 फेबरवरी 2012 को रिंकल कुमारी अगवा हूई और फिर बिना मामले को समझते कुछ लोगों ने उसे प्रम विवाह  समझने लगे वास्तव ऐसे नही था। आखिर  यही लोग जो रिंकल कुमारी मामले को अपने पसंद की विवाह का रंग दे रहे थे और Free Will का पाठ सुना रहे थे तो उन्हें चक घटना कि दोराँ Free Will का पाठ याद क्यों नही आया?

रिंकल कुमारी को जब 3 मार्च 2012 घोटकी के स्थानीय अदालत में थप्पड़ मारा गया तभी हम मुख्य न्यायधीश इफ़्तिख़ार चौधरी का सु मोटो नही सुना जब कि वाहिदा शाह  की मतदान सेटेशन पर परज़ाईनडिंग अधिकारी (औरत) को लगाई गई थप्पड़, आतीकह ओढ की शराब की बोतल और गैस मूल्य पर सु मोटोज लिए लेकिन जब ऐक लड़की पर इसी न्यायपालिका के अंदर  में थप्पड़ लगता है तो उनहोने कोई कुछ नही कहा … क्या धर्म कि नाम पर बची को अगवा  करके करके उस पे शारीरिक हिंसा करना जाइज़ है?

 

कहाँ है महिलाओं के अधिकार पर बात करने वाले?

 

कहाँ है डरोन हमलों पर गैरत की बात करने वाली वह जनसभाऐं ?

 

क्या रिंकल कुमारी इस देश की बेटी नही?

 

रिंकल कुमारी मामले एक नही था लेकिन इसके साथ आशा कुमारी और लता कुमारी का भी मामला था. तो क्या यह सब प्यार की शादी के मामले में आता है….

 

अगर  ऐसा है तो थोरा पूछ लते आपके पार्टी के एम एन मियां मीठु से कि कया उन्होने प्यार की शादी करवाने का ठेका ले रखा हैं ?

 

यदि ऐसा ही हैं तो सिर्फ हिंदू लड़कियां क्यों मुस्लिम लड़कियां और हिंदु लड़को की शादी कयूं नहि कराते करते?

आज तक इस मूल्क  के किसी न्यायपालिका ने सवाल नही पूछा कि किस रूप में हिंदू लड़कियां मियां मीठा की हवेली में रहती हैं? क्या उनहे इस बारे में जानने की कोशिस की  ?

 

रिंकल कुमारी मामले में 11 मार्च 2012 कराची प्रेस क्लब में बंदूक के सहारे की गई प्रेस कांफ्रेंस और 25 फेबरवरी से लेकर 10 मार्च तक बयान के मदेमजर जो लोग यह कहते हैं कि रिंकल कुमारी मामले पसंद की शादी का नाम दते हैं तो हमें समझाए कि या तो 11 मार्च वाली सम्मेलन सही था और इससे पहले जो कहा गया सब झूठ था?

 

मार्च 2012 रिंकल कुमारी को सिंध खाय कोर्ट में लाया गया, मैं वहाँ ऑफ मौजूद थी.

 

रनकल जिस तरह लाई गई वह द्रष्य दुखद था । मियां मीठू के लोग न्यायपालिका के कमरे में मौजूद थे जैसे मानो उनमे और राज्य  पुलिस में कोई भी फर्क ना हो। ओर रिंकल कुमारी की माँ, अंकल राजकुमार और उसके साथ रिंकल बहन जो रिंकल की तरह ही मासूम थी वह न्यायपालिका के कमरे में केवल न्याय की अपील कर रहे । यह द्रष्य इनता भावुक था की में भी अपने आंसु रोक नही पाई .

रिंकल! जज के सामने थी और तीन महिलाएं जिनमें से एक पुलिस वर्दी में थी तो दो औरतें शायद वह पुलिस में नही थी क्योंकि उन्होंने इस पुलिस वाले औरत को साइड लाइन किया गया था.

 

रिंकल को सख्त घेरे में लिया गया था वह चुप रही शायद वह यह देख रही थी कि अब घोटकी के बाद मेरे साथ क्या होगा ?

 

क्यों के घोटकी / शखर  पुलिस स्टेशन में जो रिंकल कुमारी के साथ हुआ उस पर मानवाधिकार रखवाली चुप क्यों थे?

 

 यह राजकुमार जिसने पहली बार उठकर कहा कि अब बहुत हुआ. पहली बार किसी ने इस बहादुरी से स्टैंड लिया लेकिन किसी ने उसकी हिम्मत का समर्थन नहीं किया?

 

सिंध हाई  कोर्ट के बाद जब यह मामला इस्लामाबाद गया  तो प्रेस कांफरेंस में सिर्फ एक मारवी सरमद ने ई साथ दिया.

मुख्य न्यायाधीश इफ़्तीखार चौधरी ने ऐक उम्मीद जागाई के इस देश में हिन्दुओं को न्याय मिलेगा 26 मार्च 2012 को  रिंकल कुमारी ने कहाँ मैं अपनी माँ के साथ जाना चाहती हूँ लेकिन मामले को 18 अप्रैल तक आगे किया गया. कहा गया लडकियां सदमें में हैं

खैर! 18 अप्रैल से पहले यही मैं इक संपादकीय लिखा था कि Rinkle is not allowed to go with her Mother  जिन्ना कि देश में इक बच्ची को अनुमति नही कि वह  अपने माँ के साथ जा सके. “रावलपिंडी की अदालत ने इक बार फिर सिंध के हाथ न्याय से खाली कर दिए यह शब्द राजकुमार थे जिसने टूटी हुई आवाज़ में कहाँ हम हार गए. अदी (बहन) वेनगस आप सही थी कि न्याय नही मिलेगा. “

 

जिस जिस ने रिंकल के लिए आवाज उठाई सबके हाथ केवल इक रसीद दी के को अनुमति नही कि वह अपने माँ के साथ हो …!

 

जब 18 अप्रैल 2012 को वह दबाव में थी तो उस दिन मुख्य न्यायाधीश चौधरी साहब को क्यों याद नही आया , जब खुद उनहोने कहा था कि रिंकल को क्यों लेकर आ रहे हो क्या वह ह अपराधी है? रनकल ने मुख्य न्यायाधीश को पत्र में क्या लिखा था,  अखिर मामले को ओपन अदालत में क्यों नही सुना गया?

 

रिंकल कुमारी के साथ जो कुछ शेंलटर हाउस में हुआ जो रिपोर्ट भी अखबारों में हुआ पर एक्शन क्यों नही लिया गया?

 

नाम ना लिखने की शर्त पर ऐक शख्श नें बताया कि मुख्य न्यायाधीश चौधरी साहब को “इस देश कि ऐक बड़े प्रोफाईल  प्रसन्न ने फोन करके निर्णय हिन्दुओ के पक्ष में ना दे ने को कहा. आखिर वह कौन है जिसकी बात सुनी जा सकती है । कम कम चौधरी साहब राष्ट्र पती जरदारी साहब की तो बात नही सुनते हैं तो फिर कौन है वह ?  इस बात में कितनी सच्चाई है?

 

रिंकल कुमारी मामला महज एक लडकी का मामला नही है इसके बाद कितनी लड़कियां धर्म के नाम पर अगवा हुई जिसमें मनीषा कुमारी अगस्त , सुनीता महेशवारी अगस्त, मोमल मेघवाड़ नवम्बर, श्रीमती लाल पर शारीरिक हिंसा , 5 साला बच्ची वेजंती का बलात्कार डिसेम्बर में हुआ  यह सारे मामले रिंकल कुमारी, आशा कुमारी मामले के बाद 2012 में हुई हुए. किसी इक मामले पर देश के मानवाधिकार, महिलाओं के अधिकार पर बात करने वालों ने इक आवाज़ भी नही उठाई … क्या यह 8 जीवन न्याय के हकदार नही ?

 

या फिर धर्म के नाम पर अन्याय का तमाशा दिखते रहते  और समाज के ठीकदारों से सुनते रहें जो वह पाठ पढाऐं ?

शरख जतोई मामले में मीडिया ने क्या मानवाधिकार गीत गा सकते हैं तो फिर हिन्दुओ , ईसाइयों और अहमदीं के लिए चुप का रोज़ा क्यों?

 

फिर अभी यूं ऐन ओ से बात उठाई जाती है तो सच है.

 

Selective Justice & Selective Human Rights & Selective Media उसे समाज में जहां गरीब की ना सुनी जाए और अमीर के गिलास टूटने पर मातम मनाया जाए वहां पर न्याय तो दूर की बात है इक आवाज़ दर नही उठे, और हमने देखा भी यही .

 

रिंकल कुमारी मामले पर मैंने एक ऑनलाइन लाइन पोल सर्वेक्षण करवाया जिसमें 1,049 लोगों ने वोट डाले और जिसमें रिंकल कुमारी को माँ के साथ मिलने के लिए कहा गया और धर्म के नाम पर अपराध करने को Condemn किया गया और अपराधियों को सज़ा देने को वोट दिए गए.

 

रिंकल कुमारी मामले को आज ऐक वर्ष होने को आया है हम को नही जानता रिंकल कैसे  और किस हाल में है

 

क्या सुप्रीम कोर्ट मियां मीठु से पूछना पसंद कर गया के आखिर रिंकल कुमारी उसके कसटडी में क्यों है? नेवद शाख कहाँ पर है? रिंकल अपने माँ के घर क्यों नही जा सकती और यह क्यों नही मिल सकती?

 

रिंकल आम जीवन क्यों नही बिता रही? और उसके साथ आशा कुमारी भी कहां है? वर्तमान पीपुल्स पार्टी जो आज सत्ता में है उसने हिन्दुओं  पर होने वाली अन्याय और अत्याचार के खिलाफ आवाज क्यों नही उठाई?

 

आखिरकार कुछ लोगों को पता चल ही गया कि रिंकल कुमारी को अगवह किया गया है. जिसमें हुसैन हारूं को किसे भूल सकते हैं जो यूं ऐन  में पाकिस्तानी राजदूत के रूप में काम कर रहे थे उस समय उन्हें रिंकल और हिन्दुओं की  याद नही आई  लेकिन अब वह बोलते हैं. जब जरूरत थी कोई नही आया अब तो कुछ लोगों ने चुप का रोज़ा टोड़ते है …!

 

सवाल यह है जब रिंकल पुकार रही थी उस समय उनमे चुप्पी क्यों थी? आज के दिन वे यह  Confess वह भी कर लें जिन्होंने चुप का रोज़ा रखा था कि रिंकल कुमारी से लेकर वेजंती तक उनकी चुप्पी ने नाहक को छूट दी.

 

काश! यह ही विरोध 18 अप्रैल 2012 को होता तो आज रिंकल कुमारी, आशा कुमारी, मनीषा, सुनीता, मोमल हर नारी अपनी माँ की गोद में होती …!

 

हाँ हलीना ने सच ही तो लिखा है कि

 

 क्या तुम ने ना सुना, जब मेरे दर्द की हर बार बोली लगी …?

 

लेखिका – वेंगस यसमिन, कराची सिंध (veengas.journalist@gmail.com)   

Twitter id: @veengasJ

अनुवाद- राकेश लखाणी , गांधीधाम , गुजरात (rakesh.lakhani@gmail.com)

Twitter id: @rakesh_lakhani

 

 

ऐक ओर चौबीस फर्वरी

 

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सिंधी लेखिका अमर सिंधु

अमर सिंधु सिंधी लेखन में ऐक अहम नाम हैं। अमर जी सिंधी , उर्दु तथा अंग्रेजी में लिखा करती हैं। रिंकल कुमारी के हिमायति वे खुद भी हिस्सा ले चुकी हैं। पेश हैं ुनही का लिय़ा हूआ लेख –

ऐक ओर चौबीस फर्वरी

आज चौबीस फरवरी है. यह वह दिन है जब पिछले साल इसी तारीख़ पर रनकल अपने घर प्रकार उठाई गई, जैसे किसी के घर डाका डाल कर जल्दी जल्दी डाके की चीजें उठाई जाती हैं. यह दुपट्टा और पैर में पहनी एक चप्पल घर के धलीज़ पर ही रह गई थीं.

अपहरण के बाद पहली बार मीरिपोर माथीलो की अदालत में पेश किया गया तो उसने वापस माता पिता के पास जाने का आग्रह किया. अदालत ने उसे बजाय माता पिता के पास भेजने के कहा कि वह अभी बौखलाहट का शिकार है, इसलिए इसे दो दिन सोचने के लिए कर फिर से ही बंदूकधारियों के हवाले कर दिया गया, जिनमें पे अपहरण का आरोप था. यह शायद अदालत की अपनी बोखुलाुट्ट थी.

अठाईस फरवरी को अगली बार कछरी में उपस्थिति के समय, अपने बयान में शब्द पड़ह कर रनकल से फ़्रीाल शाख बनने में उसने दस मिनट से भी कम समय लिया और स्वीकार इस्लाम के इस बयान पर उसे हथियारों के पहरे में कचेरी तक लाने वाले सैकड़ों बंदूक बर्दार और मरीदान दरगाह भरचविंडी अपने हथियारों के मुंह खोल डाले और अदालत परिसर में ही अपनी खुशी व्यक्त कर डाला. यह एक नई जीत थी.

जीत का जश्न सारे शहर में हवाई फायरिंग की गूंज में गश्त करता, बीबीसी फ़्रीाल को लेकर जुलूस के रूप में दरगाख भरचविंडी के गद्दी चीज़ें समझ और पीपुल्स पार्टी के मियां मठो पर रवाना हुआ. बीबीसी फ़्रीाल उन्हीं अतिथि थी और इन्हीं के पहरे में अदालत तक पहुंची थी.

दरअसल रनकल देवी को बीबीसी फ़्रीाल बनाने का सौभाग्य कोीी पहला पदक नहीं था जो दरगाख शरीफ प्राप्त हुआ था. सिंध में विभाजित पहले हिंदू मुस्लिम दंगों से प्रसिद्ध मस्जिद मंजिल स्थान की घटना से लेकर हिन्दू गायक भगत कंवर राम की हत्या तक घटनाओं में दरगाह शरीफ के हवाले बार बार धराए जाते हैं.

विभाजन से पहले भी दरगाख पर भाई बन्दों को शब्द गो बनाने का अभ्यास आम थी और विभाजन के बाद बाकी के बंटवारे का काम भी अब तक यूनहय जारी सारी है.

सहराए थार से लेकर कश्मोर के कोने तक संधू में दरगाह शब्द गो आबादी में लगातार वृद्धि में उदाहरण आप है. इसलिए राज्य खदादाद इस्लामी गणतंत्र में स्कूल मास्टर, रनकल का पिता कहाँ तक यूँ उठाई गई बेटी की वापसी युद्ध लड़ता . फिर मिला रेसिंग मस्जिद तक ही तो होती है उसी तरह अगर यह सताए हुए भाव मानवाधिकार संगठनों या मीडिया तक पहुँच जाये तो इतना जरूर हो जाता है कि कई एक सिर फिरे न्याय दिलाने के अनजाने जिहाद का बीड़ह उठा लेते हैं .

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रिंकल कुमारी की मां सुलक्षणी बाई- कराची में ऐतजाज में फोटो- अमर सिंधु

 

 
इस्लाम धर्म से बीबीसी फ़्रीाल की उल्फत थी, नेवते शाह का प्रेम स्वर चड़ह कर बोल रहा था या फिर मामला अपहरण और जबरदस्ती वाला ही था कि जो आरोप भरचविंडी के गद्दी चीज़ें समझ मियां मठो पर लग रहा था.

शोर अधिक हुआ तवोालियान दरगाह बीबीसी को लेकर कराची प्रेस क्लब भी पहुंचे मगर यहां भी बीबीसी साहेबा ने भला क्या बात करनी थी. बंदूक पुनः मरीदान दरगाह बाहर गाड़ी में थे तो वालियान दरगाख उसकी बगल में बैठे हुए थे. भय और खरास की मारी फ़्रीाल बीबीसी की मुँह दिखाई और सार्वजनिक में फिर से शब्द शरीफ दोहराने की रस्म पर जब सिविल सोसाइटी का शोरो रु समाप्त नहीं हुआ तो अंततः बड़ी अदालत को नोटिस लेना पड़ा. वह और कुछ कह सकी या नहीं, संधू खाई कोर्ट के न्यायाधीश बाजवह के चैंबर में इतना जरूर कह गई थी कि उसके साथ अत्याचार हुआ है.

छब्बीस मार्च को इस्लामाबाद की बड़ी अदालत में कोर्ट नंबर एक में चीखती, चिल्लाती रह गई कि उसे शील्टर खाउस नहीं, अपनी माँ के पास भेजा जाए. मगर माथीलो के जज की तरह बड़े जज ने भी चीख़ने चलाने को घबराहट समझ कर उसकी माँ के बजाय शील्टर खाउस भेज दिया ताकि वह विचार से काम ले सके.

वह बेन करती माँ से गले तो न मिल पाई कि अपराधियों की तरह दोनों बाज़ोउं से महिला सिपाही पकड़े हुए थी मगर उसने रोती माँ को चीख इतना जरूर कहा;

” अम्मा, किससे न्याय मांग रही हो. यह मुसलमानों का देश है. यहां नीचे से लेकर ऊपर तक सब आपस में मिले हुए हैं. ”

यह नौ मुस्लिम फ़्रीाल की नहीं, रनकल की गुहार थी जो कोर्ट रूम के शोर में दब गई थी. अगली बार बयान बजाय कोर्ट रूम के रजिस्ट्रार के कार्यालय में हुआ और नोमसलम लड़की माँ बाप सेगले मिलने के बजाय पुलिस कसटडी में पिया घर भेजा गया.

कोर्ट की कहानी यहाँ समाप्त होीी पर दर्द और बेबसी की कहानी का आरंभ था कि किसी को किसी अदालत से न्याय की उम्मीद नहीं रही थी. रनकल के बाद आशा, लता, अरुणा, देवी, भगवन, और श्रृंखला यह रूप कर चुका है कि एक लड़की दुर्गा का चाचा मेरे पास बर्थ प्रमाणपत्र लाता है, जिसमें उसकी जन्मतिथि वर्ष एक दर्ज है. वह अवयस्क कमसिन सड़क उठाई गई थी और तीसरे दिन उसके इस्लाम स्वीकार करने की खबर स्थानीय अखबार में छपी तो वह सटपटाया हुआ पूछता रहा कि मेरा मामला कौन सी अदालत लड़े है?

उमरकोट के कमसिन ोजनती बलात्कार का शिकार हुई, उसकी दादी कल यह कहते कहते रो पड़ी थी कि अगर न्याय न मिला तो वह भी परिवार लेकर भारतीय चली जाये जाएगी, अब उनका दाना पानी खत्म हुआ चाहते है कि पाकिस्तानी राष्ट्र अब मुस्लिम ामह का लबादा ओढ़े इस यात्रा को चल पड़ी है, जहां गीरमसलम पाकिस्तानी की पहचान फ़ील्ड नहीं है.

आज फिर चौबीस फरवरी है. किसी प्रभावशाली दरगाह और स्कूल के बच्चों पर जवानी उतरती ही होगी. काफ़िर! अपने बच्चियां संभाल, तुम्हारी बच्चियों पर उल्फत इस्लाम का दौर उतरता ही होगा कि फिर से नौ मुस्लिम लड़कियों की सूची तैयार है

सेकूलर सिंध के मूख से उटता हूआ नकाब

श्री हबीब अलरहमान जमाली

श्री हबीब अलरहमान जमाली

श्री हबीब अलरहमान जमाली सिंध, पाकिस्तान के ऐक नोजवान लेखक हैं जो सिंधी  समाचार पत्र अबरत ऐवं अवामी अवाज में लेख लिखा करते हैं। 22 वर्षिय श्री हबिब विगत चार पांच सालो से अखबारो से जुडे हूऐ हैं और सिंध के हैदराबाद से तालूक रखते हैं। उनका यह लेख यकिन हिमथ भरा लेख हैं। उनहोने ईस विषय पर ऐक ऐसे समय पर यह लेख लिखा हैं जब सिंध और पाकिस्तान पर मजहबी कट्ठरपन हावी हैं।

सेकूलर सिंध के मूख से उटता हूआ नकाब

रोती बिलख्ती हूई डा. लता, नालिश करती हूई रिंकल कुमारी की दर्दों भरी कहाणी को आखिर कौन प्रकाशित करेगा, …. और सिंध जी इजत को दाउ पर लगाने वालों को आखिर कोन जबाव मागने की हिमथ बठोर पाऐगा…यह सवाल मात्र सामाजिक कार्यकर्ता ऐवं लेखक मारवी सिरमद जी के ही नही पर सिंध, जेकोकाबाद के रहवासी डा. लता के पिता डा. रमेश कुमार, या ना ही मिरपूर माथिले के निवासी और रिंकल कुमारी के मामा श्री राज कुमार के हैं पर यह सवाल हर उस मां के हैं जिनकी बेटियां हथियार के जोर पर अगवा करके जबरन मजहब तबधील कराऐ जाने के बाद उनकी शादियां कराई गई और उनकी माताऐं आज भी दिवाली की शुशियों से महरूम रह गई हैं, उनके लिऐ तो मोनो आज भी उनकी सिताऐं रावण खे किलो में कैदि हैं। यह भी ऐक हकिकत हैं कि मजहब की आड में सिंध के हिंदु धर्ती पुत्र रोज रोज बदनाम होने के कारण हाथ से हाथ छूडा कर, हर सिशते तोड कर हिंदुस्तान पलायन कर रहे हैं। वे अपनी सिंधु धर्ती के लिऐ मर मिटने को तो त्यार हैं पर अपने बेटियो जी इज्जत निलाम होते हूऐ नही देख सकते।

डा लता और रिंकल कुमारी वाले मसले पर मिडिया समेत सियासी दलो के अल्पसंख्यक नेताओ की ताज्जुब करने वाली खामोशी अख्तयार की । यहि कारण हैं कि सिंध का हिंदु समूदाऐ मायूस होकर अपनी ही धर्ती मां से बेवफाई का राह अख्तियार करने को मजबूर हूऐ हैं, और अब तह हजारो जी तादादि में हिंदु अपनी धर्ती को अलवादा कर चूके हैं।

अब जुछ ही दिन पहले ठूल (उतर सिंध) से पाच हिंदु खांदान जिनकी कुल संख्या 15 बताई गई वे धर्ती मां जो अखिर अलविदा कर गऐ। अपने सगे सबंधीयो से अलविदा होने के वक्त मानो अखों से खून के आंसु बहने लगे. उनकी भावनाऔ को लफजो में वर्णन करना यकिनि मूशकिल था। यद्दपि यह ऐक हकिकत हैं कि हिंदु परेशान हैं और उनहे मदद करना तो दूर उनहे इनसान लायक भी नही समझना जाजती हैं और ऐसी जाजतियो के चलते ही वे सिंध को अविदा कह रहे हैं। कोई भी शख्स खुशी खुशी अपने पूर्खो की  मां समान धर्ती नही छोडना चाहता जिस्से उनेके बचपन की यादे जुडी हो।

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रिंकल कुमारी , अदालत के बाहर कानजारा , तथा उनके कथित पति तथा अगवाकर्ता

जिस के सिने पर खेलते हूऐ बडे हूऐ , मां कि उकलियां पकड कर चलना सिखे हूऐ हो, आज जब उस मातृभूमि से कच्चे धागे कि तरह आलग हो रहे हो तो महसूस होता हैं जैसे मानो हमारे सिंध के वजूद के दो हिस्से हो रहे हों।

कहां गई वह धर्मनिपेक्ष सिंध…..कहां गई वह सिंध जिस में हिदु मूसलमान ऐक हिक ही साथ रहा करते थे, ऐक ही साथ कंलंदर के धमाल में शामिल होते हैं तो दिवाली के दिऐ भी साथ जलाया करते थे। आज जब हिंदु भाई सिंध छोड के जा रहे हैं तो लाजमि हैं कि उन की जगह दुसरे मूल्को से पलायनि किये हूऐ पनाहिगिरि लेंगे जिस से यकिनि तोर सिंधी भाषा को ऐक जबरदसत धका लगेगा और मूमकिन हैं कि सिंधी (मूसलमान) अपने ही सुबे में अल्पसंख्यक हो जाऐं। आज जरुरत इस बात की हैं कि हम किसा राम जा इंतजार किऐ बिना राजनितिक दल, बुद्धिजीवीयों, लेखको को निहायति संजिदीगी से सोचे नहि तो कहि ऐसा ना हो कि मजहबी इंतहापसंदी हर जहन पर हावी हो जाऐ और हम हाथ मलते ही रह जाऐं।

लेखक- श्री हबीब अलरहमान जमाली

अनुवाद – राकेश लखाणी